नई दिल्ली में हाल ही में हुई एक बैठक में, भारत ने प्लास्टिक के वैश्विक संधि पर अपनी चिंताएँ व्यक्त की हैं। इस चिंता का मुख्य कारण यह है कि इस संधि के नियम और प्रावधान सतत विकास के लक्ष्यों को प्रभावित कर सकते हैं।
भारत ने जोर दिया है कि प्लास्टिक प्रदूषण की समस्या को गंभीरता से लेते हुए, ऐसा समाधान खोजा जाना चाहिए जो आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण दोनों को संतुलित कर सके। उन्होंने उल्लेख किया कि विकासशील देशों के लिए यह महत्वपूर्ण है कि उनका सतत विकास मार्ग बाधित न हो।
भारत की मुख्य चिंताएँ इस प्रकार हैं:
- प्लास्टिक के उत्पादन और उपयोग पर कड़े प्रतिबंध विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं।
- संधि में शामिल नियमों को इस तरह से तैयार किया जाना चाहिए कि वे स्थानीय उद्योगों और रोजगार को नुकसान न पहुंचाएं।
- पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है।
भारत ने दूसरे देशों से अपील की है कि वे मिलकर काम करें ताकि एक ऐसा वैश्विक ढांचा तैयार किया जा सके जो न केवल पर्यावरण की रक्षा करे, बल्कि विकासशील देशों के हितों को भी ध्यान में रखे।
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