भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने 5 अप्रैल 2024 को अपनी मौद्रिक नीति समीक्षा में रेपो दर में 0.25 प्रतिशत की वृद्धि की घोषणा की है। यह निर्णय मुद्रास्फीति की बढ़ती दर और आर्थिक स्थिरता को बनाए रखने के लिए लिया गया है। रेपो दर वह ब्याज दर है जिस पर RBI बैंकों को अल्पकालिक ऋण प्रदान करता है, और इसका सीधे प्रभाव देश की आर्थिक गतिविधियों पर पड़ता है।
घटना क्या है?
RBI के गवर्नर ने बताया कि मुद्रास्फीति दर में सुधार के लिए यह कदम आवश्यक था। मार्च 2024 तक मुद्रास्फीति दर 6.1 प्रतिशत दर्ज की गई, जो RBI के लक्षित 4 प्रतिशत से अधिक है। वर्तमान स्थिति को ध्यान में रखते हुए, रेपो दर को 6.5 प्रतिशत पर संशोधित किया गया है।
कौन-कौन जुड़े?
इस निर्णय में मुख्य भूमिका निम्नलिखित पक्षों की रही:
- RBI की मौद्रिक नीति समिति (MPC) – जिसमें केंद्रीय बैंक के गवर्नर सहित छह सदस्य शामिल हैं।
- केंद्रीय वित्त मंत्रालय और विभिन्न आर्थिक विशेषज्ञ।
- देश के बड़े बैंक और वित्तीय संस्थान, जो इस वृद्धि से प्रभावित होंगे।
प्रतिक्रियाएँ
विभिन्न क्षेत्रों से मिली प्रतिक्रियाएँ इस प्रकार हैं:
- सरकार: इस फैसले का स्वागत करते हुए इसे आर्थिक स्थिरता बनाए रखने में सहायक बताया।
- विपक्ष: ब्याज दर वृद्धि से आम जनता और छोटे व्यवसायों को कठिनाइयों की संभावना जताई।
- बैंकिंग और वित्तीय विशेषज्ञ: मुद्रास्फीति नियंत्रण के लिए आवश्यक कदम बताया लेकिन बाजार में अस्थिरता की चेतावनी भी दी।
- व्यापार जगत: सावधानी रखी जा रही है और आर्थिक गतिविधियों पर प्रभाव का आकलन किया जा रहा है।
तत्काल प्रभाव
रेपो दर बढ़ने से बैंकों द्वारा व्यावसायिक और उपभोक्ता उधारों पर ब्याज दरें बढ़ाई जा सकती हैं, जिससे कर्ज लेना महंगा हो जाएगा। इसके परिणामस्वरूप उपभोक्ता खर्च और निवेश पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। साथ ही, वित्तीय बाजारों में हलचल देखी गई है।
आगे क्या?
RBI ने अगली मौद्रिक नीति समीक्षा जुलाई 2024 में करने का संकेत दिया है। आगे के नीतिगत फैसले मुद्रास्फीति और आर्थिक विकास के आंकड़ों पर निर्भर होंगे। सरकार तथा वित्तीय संस्थान इस अवधि में आर्थिक स्थिति का निरंतर मूल्यांकन करेंगे।
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