सुप्रीम कोर्ट में वक्फ संशोधन अधिनियम को लेकर करीब चार घंटे तक गहन बहस हुई, जिसमें याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल, राजीव धवन, अभिषेक मनु सिंघवी और सीयू सिंह ने अपनी दलीलें प्रस्तुत कीं। चीफ जस्टिस ने स्पष्ट किया कि संसद द्वारा पारित कानून को तब तक संवैधानिक माना जाएगा जब तक कोर्ट कोई निर्णय नहीं देता।
मुख्य दलीलें और पहलू
कपिल सिब्बल ने कहा कि यह कानून वक्फ संपत्ति की सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि उसे हथियाने के लिए बनाया गया है। उन्होंने निम्नलिखित बिंदुओं पर जोर दिया:
- मस्जिदों में मंदिरों की तरह चढ़ावा नहीं होता, जिससे उनके प्रबंधन में भेदभाव हो रहा है।
- नए कानून के अनुसार, रजिस्ट्रेशन न होने पर संपत्ति को वक्फ संपत्ति नहीं माना जाएगा, जिससे कई मस्जिदों का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है।
- अगर किसी मस्जिद को ASI संरक्षित स्मारक घोषित किया जाता है तो उसका वक्फ दर्जा खत्म हो सकता है, जिससे मुस्लिमों के पूजा के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।
- धर्मांतरण के बाद पांच साल तक वक्फ करने पर रोक और गैर मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति जैसे प्रावधान असंवैधानिक हैं।
सरकारी अधिकारियों के जांच अधिकार पर सवाल
सरकारी अधिकारियों को विवादित संपत्ति की जांच का अधिकार देने पर भी सवाल उठाए गए हैं, क्योंकि इससे संपत्ति की स्थिति प्रभावित हो सकती है। कपिल सिब्बल ने इसे ऐसे बताया कि जैसे मुवक्किल अपने ही केस में जज हो।
संवेदनशीलता और विवाद
इस बहस के दौरान मंदिर, मस्जिद, और दरगाह के चंदे का जिक्र भी हुआ, जिसने मामले की संवेदनशीलता को और बढ़ा दिया।
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